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मैं हारी! भाग 9

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7th June 2024 | 2 Views

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“नहीं यार मैंने ऑनलाइन देख लिया है। आउट ऑफ स्टॉक बता रहे हैं।” पल्वशा ने अदिति से कहा था। 

“फिर तो तुझे वह बुक एमजी रोड गुप्ता एंड सॉन्स बुक स्टोर पे ही मिलेगी।” अदिति ने पूरे यकीन से कहा था। 

“मगर वह तो यहां से बिल्कुल दूसरी तरफ है। मैं वहां पहले कभी गई भी नहीं हूं।” पल्वशा ने परेशान होते हुए कहा था। 

“तुम्हें तो आदत है हर छोटी-छोटी बात पर परेशान होने की। तुम्हारे पास कार है चली जाऊं। इतनी भी क्या परेशानी की बात है?” अदिति ने थोड़ा डांटे हुए कहा था। उसकी बात सुनकर पल्वशा थोड़ा सोच में पड़ गई थी, तभी अदिति ने उससे कहा था “ठीक है मुझे देर हो रही है…मैं जा रही हूं।” यह कहकर वह निकल गई थी और पल्वशा ने भी तब तक इरादा बना लिया था कि वह एमजी रोड की तरफ जाएगी। उसे वह गाइड बुक चाहिए थी क्योंकि एग्जाम नजदीक आ रहे थे। 

वह कॉलेज के गेट से बाहर निकल कर अब पार्किंग एरिया में अपनी गाड़ी के पास आई थी। नजर एक बार फिर उस आदमी पर पड़ी थी और उसके अंदर तक कड़वाहट उतर आया था। मूंह ही मूंह कुछ बड़बड़ाया था और ड्राइविंग सीट संभाल ली थी। जैसे ही उसने अपनी ड्राइविंग सीट संभाली वह आदमी भी अपनी कर के ड्राइविंग सीट संभाल चुका था। पल्वशा उसे नजर अंदाज करना चाहती थी मगर कर नहीं पा रही थी। साइड मिरर से वह बार-बार अपने पीछे आती हुई कार को देख रही थी और कुछ ना कुछ मुंह में बड़बड़ा रही थी। पल्वशा की कार जैसे ही मामूल के रास्ते से हटकर मोड़ कटी वैसे ही उस आदमी की कार की रफ्तार तेज हो गई थी। पल्वशा ने अब एमजी रोड के रास्ते पर अपनी गाड़ी दौड़ा दी थी और वह आदमी भी काफी तेजी से उसके कार के बराबर में आ गया था। 

“मैडम उस रास्ते पे आपका जाना मना है।” उस आदमी ने तेज आवाज में पल्वशा से कहा था। पलवशा उसे नजरअंदाज करते हुए अपने जबड़े को कस कर अपने गुस्से को काबू में कर रही थी। 

” मैडम आप कार रोकें आप आगे नहीं जा सकती।” उस आदमी ने इस दफा पहले से ज्यादा ऊंची आवाज में कही थी। उसे लगा था शायद पल्वशा ने उसकी आवाज नहीं सुनी। 

मगर पल्वशा तो सब कुछ सुन कर भी अंसुना कर रही थी बल्कि अब गाड़ी की स्पीड उसने पहले से काफी ज़्यादा बढ़ा ली थी। यह देख उस आदमी ने भी अपनी कार की रफ्तार बढ़ा ली थी। दोनों की कार जैसे रेस में थी। आगे पीछे आगे पीछे हो रही थी। पल्वशा उस आदमी की कर को अपने बराबर में नहीं देखना चाहती थी जबकि उस आदमी की कोशिश थी कि वह पल्वशा की कार को ही रुकवा दे और इसी में उस आदमी ने एक्सीलरेटर दबाया था और काफी तेज़ी से आगे बढ़ कर अपनी कार को दाहिना मोड़ कर ठीक पल्वशा की कार के सामने जा रुका था। पल्वशा ने भी बर्क रफ्तारी के साथ गाड़ी को ब्रेक लगाया था। उसकी गाड़ी उस आदमी की गाड़ी से टक्कर खाने से बाल बाल बची थी। 

***

“ओये मिर्ज़ा! वो देख….” दीपक ने उसके कंधे को टटोलते हुए कहा था जबकि नज़र उस की सामने आती हुई लड़की पे टिकी थी। 

शहान मिर्जा जो की दूसरी तरफ़ मूंह फेरे सिग्रेट के कश लगा रहा है उसकी बात पे एक लख्त ही मुड़ा था। और उसे देखता रह गया था जो दीपक उसे दिखाना चाहता था। इस वक्त कॉलेज के तमाम स्टूडेंट वह कर रहे थे जो वह यहां इस कॉलेज में करने आते हैं। यानी के क्लास अटेंड कर रहे थे मगर यह शाहन मिर्जा का ग्रुप था जो कॉलेज पढ़ने कम और आवारा गर्दी करने ज्यादा आते थे। पूरा कॉलेज इस ग्रुप की वजह से परेशान था और शायद इसी वजह से इस ग्रुप का कॉलेज पर दबदबा भी था। कॉरिडोर की बॉउंडरी पे वह सब बैठे सब गप्पों में मस्त थे और शाहान मिर्ज़ा सिग्रेट के कश लगाने में। 

“बुर्का का तो पता था, इतनी बड़ी चादर लपेटकर कौन आता है कॉलेज? ऐसा लग रहा है जैसे पलंग की चादर ओढ़ कर आ गई हो।” दीपक के बगल में बैठा आरिफ ने मजाक उड़ाते हुए कहा था। 

“लगता है फर्स्ट ईयर है।” रोनित ने कहा था। 

” यह तू कैसे कह सकता है?” दीपक को ऐतराज हुआ था। 

“यार पहली दफा देखा है इस चेहरे को और उसके चेहरे पर जो डर और घबराहट है उसे साफ पता चल रहा है।” रोनित ने दलील दी थी शहान मिर्जा अब भी चुप था। 

“तो फिर इंतजार किस बात का है? चलो चलते हैं…. ” शहान मिर्जा जो कॉरिडोर के बाउंड्री पर बैठा था उस से कुदने के अंदाज़ में नीचे उतर आया था और उसके पीछे-पीछे उसके बाकी सारे साथी भी। 

” रुक जा ओ दिल दीवाने पूछूँ तो मैं ज़रा, अरे लड़की है या है जादू खुशबू है या नशा।” आरिफ गाते हुए आगे बढ़ा था। 

शहान मिर्ज़ा उस ग्रुप का लीडर था इसलिए सबसे आगे आगे था। वह लड़की अपनी ही धुन में कॉलेज की मेन बिल्डिंग की तरफ बढ़ रही थी जब भी शहान मिर्जा बर्क़ रफ्तारी के साथ उसके आगे जाकर उसका रास्ता रोका था। वह लड़की सकपका कर पीछे हटी थी अगर ना हटती तो उस से बुरी तरह टकरा जाती। 

“न्यू एडमिशन”? शाहान मिर्ज़ा ने सवाल पूछा था। सवाल उस से किया था मगर उसका सारा ध्यान अपनी दूसरी सिगरेट को सुलगाने में लगा हुआ था। वह लड़की घबराहट के मारे अपने कंधे पर टंगा हुआ बैग को अपनी सीने से भींच ली थी। शाहान मिर्जा सिगरेट सुलगा चुका था। सिगरेट का एक कश लेकर उसका धुआं फिजा में उड़ने के बाद अब वह उस लड़की पर मुतावज्जोह हुआ था। 

“बेहरी हो?” दूसरा सवाल पूछा गया था। शाहान मिर्जा के पीछे बाकी लड़के खड़े होकर मज़ा ले रहे थे।  

इस सवाल पर लड़की और घबरा गई थी फिर भी उसने गर्दन हिला कर नहीं में जवाब दिया था। 

“तो गूंगी हो?” फिर से सवाल किया गया। 

“न…नहीं।” जवाब देते हुए लड़खड़ा गई थी। नज़रें नीची रखे हुई थी। शाहान नज़रें बदसतूर उसी पे टिकी हुई थी और बोहत अजीब ढंग से। 

“नाम क्या है?” शाहान मिर्ज़ा उसकी घबराहट को काफी दिलचस्पी से देख रहा था मगर फिर भी लहजे का रोब बरक़रार रखा था। 

“स… सा….ब… साहिबा।” साहिबा ने जवाब देकर एक नज़र उठाया था और तुरंत झुका भी ली थी। 

और शाहान?…. 

वह तो उसका नाम सुनकर जैसे जम सा गया था। पीछे से दोस्तों ने एक साथ बुलंद आवाज़ में छेड़ा। 

“ओहो

 मिर्ज़ा! क्या बात है! ये रही साहिबा!”

आगे जारी है:-

T. Khan

@T.-Khan

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