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मैं हारी! भाग 7

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19th May 2024 | 3 Views

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“इस गांव की लड़कियां आठवीं जमात के बाद पढ़ नहीं पाती क्योंकि आठवीं जमात के ऊपर हमारे गांव में स्कूल ही नहीं है। लड़के दूर पढ़ने के लिए चले जाते हैं मगर लड़कियां कैसे जाएं?.. इसलिए उनकी पढ़ाई रोक दी जाती है। एक तो दूर दराज स्कूल ऊपर से बस और मोटरों के धक्के… मगर हमारे घर में सहूलियत थी। घर में गाड़ी थी और ड्राइवर भी इसलिए हमने साहिबा को आगे तक पढ़ा दिया। आई ए करने के बाद साहिबा इस गाँव की सब से पढ़ी लिखी लड़की है।” रात को बैरम खान बिस्तर पर लेटे अपनी बाह का तकिया छोटी बी के सर के नीचे रखे उन्हें बता रहे थे। 

” क्या गांव में आठवीं जमात की बाद कोई स्कूल नहीं है?”  छोटी बी को हैरानी हुई थी। 

“हां …नहीं है।” बैरम खान ने छोटी बी की हैरानी पर ठंडी सांस भरी थी। 

“तो आप लोग क्या कर रहे है? क्यों नहीं खोल रहे यहाँ कोई स्कूल?” छोटी बी उनके बाँह पर से अपने सर को उठाकर अब बिस्तर पे उठ बैठी थी। 

“आराम से।” उसके झटके से उठने पर बैरम खान को उनकी फिक्र हुई थी। 

“मैं कुछ पूछ रही हूं आपसे?” छोटी बी ने बैरम खान की बात को नजरअंदाज करके अपना ही सवाल किया था। 

“हम क्यों खोलें स्कूल? यह काम हमारा नहीं सरकार का है।” बैरम खान ने थोड़ा तंग आते हुए कहा था। 

“इस गांव में कानून तो आप सब चलाते हैं और स्कूल खोलने का वक्त आया तो सरकार याद आ गई? बहुत अजीब बात है!” छोटी बी ने तंज़ किया था। बैरम खान लाजवाब हो गए थे। 

“अगर लड़कियों का लड़कों से ज़्यादा पढ़ाना इस गाँव के लोगों के अना (ego) का मसला है फिर तो स्कूल होने की वजह से यहाँ के वो भी लड़के पढ़ाई करेगे जो नहीं करना चाहते या जो पढ़ाई को ज़रूरी नहीं समझते क्योंकि उन लड़कों के घर वालों को ये डर रहेगा की गाँव की लड़कियाँ लड़कों से ज़्यादा आगे ना  पढ़ ले। कम से कम इसी compettition की वजह से बच्चों में तालीम तो बढ़ेगी और मुझे पुरा यकीन है जैसे लोगों में तालीम आयेगी सारी दक्यानुसी (आउट डेटेड) सोच खत्म हो जाएगी। और मुझे ये भी यकीन है गाँव में स्कूल आने की देर है यहाँ की हर लड़कियाँ पढ़ाई करेंगी क्योंकि लड़कियों को पढ़ने का शौक होता है।” छोटी बी होंठों पे मुस्कान लेकर जैसे अपने आँखों के सपने बैरम खान की आँखों पे रख रही थी। बैरम खान मुस्कुराते हुए उनके चमकते हुए चेहरे को देखते रह गए थे। 

“कभी कभी लगता है तुम से शादी कर के मैंने बोहत बड़ी गलती कर दी।” बैरम खान ने मुस्कुरा कर कहा था। । 

” कोई हैरानगी की बात नहीं है. …ऐसा लग सकता है क्योंकि मुझे भी कभी-कभी ऐसे ही लगता है।” छोटी बी ने भी वैसे ही मुस्कुरा कर जवाब दिया था जिसे सुनकर बैरम खान खुलकर हंस दिए थे और हंसते चले गए थे उनकी हंसी में छोटी बी की हंसी भी शामिल हो गई थी। 

***

छोटी बी का पलंग कपड़ों के देर से भरा हुआ था और उन ढेरों के बीच में साहिबा बैठी हुई थी। उसे छोटी बी के कपड़े बहुत पसंद थे इसलिए छोटी बी अपने सारे नए कपड़े जो उन्होंने कभी नहीं पहने थे साहिबा के सुपुर्द (हवाले) कर रही थी क्योंकि वह कॉलेज जाने वाली थी। 

“साहिबा इसे भी एक दफ़ा पहन कर देख लेना…यह भी बहुत अच्छे हैं।” छोटी बी ने कपड़ों के ढेर में से एक बॉटल ग्रीन रंग का सूट निकला था जिसके गले और दामन में शीशों के साथ धागों की खूबसूरत एंब्रोइडरी की हुई थी। 

“हाँ भरजाई, ये तो बोहत अच्छा है।” साहिबा की आँखें चमक उठी थी। तुरंत छोटी बी के हाथ से वो सूट लिया था। फिर कुछ सोच कर उदासी से कपड़े वापस रख दिए थे। 

“क्या हुआ?” छोटी बी ने उसका खिला चेहरा मुरझाते देख कर पूछा था। 

“तुम ने सारे नये और अच्छे जोड़े मुझे दे दिया तो फिर तुम्हारे पास क्या बचेगा?” साहिबा ने मासूमियत से कहा था। 

“अल्हम्दुलिल्लाह मेरे पास बहुत सारे हैं…. और तुम्हें लगता है कुछ महीनो के बाद मुझे ये कपड़े आएंगे?” उन्होंने हंसकर प्रेगनेंसी की वजह से अपने भरते हुए बदन की तरफ इशारा करते हुए कहा था। 

“भरजाई तुम बहुत अच्छी है….आप मेरे लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं है।” 

” घुटन क्या होती है साहिबा ये मुझे यहां आकर पता चला। अगर मेरी वजह से इस घुटन से किसी को आजादी मिलती है तो फिर मुझे लगेगा जैसे मुझे खुली फ़िज़ा में सांस लेने का मौका मिल गया।” छोटी बी ने प्यार से साहिबा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा था। साहिबा भी जज्बाती हो गई थी तुरंत छोटी बी के गले लग गई। छोटी बी उसके सर को सहलाती रही। थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई थी फिर कुछ सोच कर छोटी बी ने ही इस खामोशी को तोड़ा था। 

“साहिबा इस आज़ादी का कभी ग़लत फ़ायदा मत उठाना वरना सब मुझे कसूरवार समझेंगे। सब कहेंगे छोटी बी की वजह से ही सब कुछ हुआ है।” छोटी बी ने संजीदगी से कहा था। 

“मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी भरजाई….तुम ख़ुद देख लेना।” साहिबा ने तुरंत छोटी बी से अलग होकर कहा था। छोटी बी उसकी बात पर इत्मिनान से मुस्कुरा दी थी। 

***

“आख़िर ये शख्स ख़ुद को समझता क्या है?… इतना गुरूर… इतना घमंड…!” पलवशा अपने दोस्तों के बीच यामीर की बात कर रही थी। 

” वह उस लायक है कि उसे खुद पर गुरुर हो।” स्मिता ने कहा था। 

“ऐसा क्या देख लिया है तुम लोगों ने उस में?” पल्वशा को अपनी दोस्त पर गुस्सा आया था। “सारी गलतियाँ तुम जैसी लड़कियों की ही है जो खामाख्वा उसे अपने हवासों पर मुसल्लत (हावी) किया हुआ है। बिला वजह ही उसे मगगुरुर बना दिया है। अरे अगर आंख उठाकर उसकी तरफ़ नहीं देखती फिर देखती की उसका सारा घमंड कहां जाता है? यही वजह है की मुझे उसकी तरह नज़र डालना भी गवारा नहीं होता। लेकिन नहीं तुम लोग उसे देख कर ठंडी आहें भर्ती हो और वो ठंडी आँहें… ” पल्वशा फिर से लीडर बनी सब को भाषण दे रही थी बल्कि यामीर के लिए अपने दिल में चिढ़ को बयान कर रही थी जब

ही माशा ने उसकी बात काटते हुए कहा था। 

आगे जारी है:-

T. Khan

@T.-Khan

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