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मैं हारी! भाग 6

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19th May 2024 | 2 Views

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अगले ही दिन गुस्से से आग बबूला होते यामीर शहर आया था ताकि सिम्मी का दिमाग़ दुरुस्त कर सके। उससे अच्छी खासी सुना सके। सिम्मी की बेवकूफी ने उसके रातों की नींद हराम करके रख दी थी। वह रात भर सो नहीं पाया था इस मलाल में कि अगर उसे कुछ हो जाता तो फिर सिम्मी की मां का क्या होता? वह खुद अपने परिवार वालों को क्या जवाब देता? कितनी बदनामी होती है उसकी? 

“तुमसे मोहब्बत करूं मैं?….जो खुद अपनी मां की नहीं हुई….एक गैर लड़के के लिए अपनी जान देने चली गई….उस मां के बारे में नहीं सोचा जिसने उसे पाला है? ऐसी लड़की से मोहब्बत करूं मैं? तुम खुद अपने दिल से पूछो….तुम हो मोहब्बत किए जाने के लायक?” वह सर-ता-पा आतिश फ़िशां बना सिम्मी पर फट पड़ा था। हॉस्पिटल के बेड पे लेटी सिम्मी का दिल किया था की वह मर जाए। उस हरजाई का चेहरा उसकी आँखों में धुंधला पड़ गया था के आँखों में आँसू भर चुके थे। दांतों तले अपने होंठों को दबाए वह अपने कर्ब को ज़ब्त करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। दिल मलाल और दुख से फटा जा रहा था। 

वहीं दूसरी तरफ़ पल्वशा कॉलेज जाने से पहले सिम्मी से मिलने चली आई थी के visting hour यही था और दूसरा शाम के वक़्त। मगर सिम्मी के कमरे के बाहर अपने दोस्तों का जमघटा देख कर वह ख़ुद भी हैरान हो गई थी। 

” क्या हुआ तुम लोग यहां क्यों खड़ी हो? अंदर जाने नहीं दे रहे क्या? लेकिन विजिटिंग आर तो अभी ही है।” पल्वशा ने हैरानी से पूछा था। 

“यामीर आया है सिम्मी से मिलने और वह सिम्मी से अकेले में बातें करना चाहते हैं।” अदिति ने जवाब दिया था। ये सुन कर पल्वशा की पेशानी सिलवटज़दा हो गई थी। 

“ओह! तो जनाब को अब ख़्याल आया है! यही फ़िक्र और कदर वह पहले कर लिया होता तो आज सिम्मी हॉस्पिटल के बेड पे पड़ी ना होती। आज अगर उसे कुछ हो जाता तब फिर यामीर साहब क्या करते? उसे कहां देखने जाते?…. जहन्नुम में?” पल्वशा ने गुस्से से अपने दांतों को किचकिचाते हुए कहा था। 

“कौन जानता है वह अंदर हमदर्दी के बोल ही बोल रहा हो?…. जिस तरह वह गुस्से में कमरे के अंदर गया था मुझे तो डर है की वह उसे ज़लील कर के मौत के घाट ही ना उतार दे।” अदिति ने पल्वशा की खुशफहमी दूर की थी। 

“यामीर खान का पसंदीदा मशगला ही यही है। पहले लड़कियों का दिल लूटना फिर हरजाई बनकर उनसे बेपरवाही बरतना और फिर उन्हें ज़लील कर के मौत के घाट उतरने पे मजबूर कर देना।” ये किरन ने कहा था। यामीर पर उसे भी टूट कर गुस्सा आ रहा था। 

“तो तुम लोग उसका हुक्म क्यों मान रही हो? उसने कहा कि कमरे से बाहर रहो और तुम लोग मान गए? अंदर चलो और उसे जलील करके हम सब बाहर निकलते हैं।” पल्वशा ने किसी लीडर की तरह सब में जोश भरना चाहा था फिर भी किसी ने उसकी हाँ में हाँ नहीं मिलाई थी। सब ख़ामोशी से उसका चेहरा देखते रह गए थे। 

“क्या हुआ तुम सभी को? उसके पीठ पीछे तो इतना कुछ कह रही थी अभी उसके मुंह पर कुछ कहने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही….रको … मैं ख़ुद देखती हूँ।” पल्वशा को गुस्सा आ गया था। 

“पल्वशा रुक जाओ… उसने जब मना किया है तो फिर अंदर जाने की कोई तुक नहीं बनती।” अदिति ने समझाया था मगर पल्वशा आगे बढ़ कर दरवाज़ा खोल चुकी थी। 

“क्यूँ पीछे पड़ी हो मेरे?… सीधी तरह से बात समझ नहीं आती? मोहब्बत तो दूर की बात है मैं तो तुम्हें पसंद भी नहीं करता। जब तुम्हें साफ़ साफ़ मना कर चुका था तो फिर क्या सोच कर मूंह उठा कर मेरे गाँव चली आई थी? तुम्हारे अंदर सेल्फ रिस्पेक्ट नाम की कोई चीज है कि नहीं? साफ़ लफ़्ज़ों में कहना तो दूर की बात अगर मुझे किसी लड़की ने इशारे से भी इंकार किया होता तो उसकी तरफ़ देखना तो दूर की बात मैं उसकी तरफ़ थूकना भी पसंद नहीं करता।” यामीर उस पर मुसलसल वार पर वार किये जा रहा था। अपने मूंह से शोले बरसा रहा था। सिम्मी को ज़लालत (अपमान) की इंतेहा तक पहुंचा रहा था। अपने अंदर का गुबार बाहर निकालने में उसने एक लम्हा भी ज़ाया नहीं की थी। बस लगातार उसे ज़लील किये जा रहा था। 

“और तुम ने क्या सोचा था? तुम्हारे मरने की ख़बर सुन कर मैं मजनू बन जाऊंगा। तुम्हारी कब्र पे आँसू बहा कर रोज़ फूल चढ़ाने आऊंगा। अरे मैं तुम जैसी लड़कियों की कब्र पर जाकर लात मारने तक की भी ज़हमत ना करू जो ज़िंदगी को किसी ग़ैर के एक तरफ़ा मोहब्बत में गवा देती हो। अगर फिर से मरने का ख़्याल आये तो ज़रा अच्छी तरह से कोशिश करना की बचने का कोई चांस ना रहे और ये भूल कर भी मत सोचना की तुम्हारे मरने पे मुझे ज़र्रा बराबर भी अफ़सोस होगा।” 

यामीर ने अपने हद दर्जा (बहुत अधिक, उच्चतम स्तर गुस्सा) गुस्से से सिम्मी को हद दर्जा ज़लालत में पहुंचा दिया था। इतना ज़लील किया था की रोना तो वो कब का भूल चुकी थी अब तो ये आलम था की यामीर से नज़रें भी नहीं मिला पा रही थी। 

और पल्वशा जो अंदर जा कर यामीर को खरी खरी सुनाने की सोच रही थी वह ख़ुद दरवाज़ा आधा खोले वहीं पे जम सी गई थी। चाह कर भी उसके कदम अंदर नहीं बढ़ पाए थे। ज़ुबान पर भी जैसे क़ुफ़्ल (ताला) लग गया था और ये क्यूँ हुआ था उसे ख़ुद भी पता नहीं था। बस एक चीज़ जो उसे महसूस हो रही थी वो थी हैरांगी। पल्वशा हैरान थी की किसी लड़के को ख़ुद पर, अपनी ज़ात पर इतना गुरूर भी हो सकता है? जो किसी के दिल को दिल नहीं समझता। कोई उसके लिए मर रहा है और उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता बल्कि वो इतनी आसानी से उसे दुबारा मरने के लिए मशवरा भी दे रहा है। 

उसे दरवाज़े पे देख कर बाकियों को भी हिम्मत मिली थी…कुछ बोलने की नहीं बल्कि अंदर का तमाशा देखने की। सब उसके अगल बगल और पीछे खड़े दरवाज़े से अंदर झांक रहे थे। 

पल्वशा सिम्मी को साफ़ देख सकती थी लेकिन चूंकि यामीर की पीठ दरवाज़े के सामने थी इसलिए वह आज भी उसका चेहरा नहीं देख पाई थी। सिर्फ जीन्स के उपर उसकी ब्राउन लेदर जैकेट में मल्बोस उसकी पीठ दिख रही थी। यामीर अपना सारा गुबार निकाल कर जाने के लिए मुड़ा था। ये देख अदिति ने तुरंत दरवाज़ा पुरा बंद कर दिया था। सारी लड़कियां भागी थी सिर्फ पल्वशा अभी भी अपनी हैरांगी में खड़ी रह गई थी जब ही अदिति को उसका ध्यान आया और उसने उसे पकड़ कर दरवाज़े के सामने से खींचते हुए हटाया था। उसी वक़्त दरवाज़ा खुला था और यामीर बिना किसी पे नज़र डाले गुस्से से तन फ़न करता वहाँ

से निकल गया था। 

आगे जारी है:-

T. Khan

@T.-Khan

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