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मैं हारी! भाग 2

T. KhanLast Seen: Apr 16, 2024 @ 5:45pm 17AprUTC
T. Khan
@T.-Khan

2nd April 2024 | 1 Views
Milyin » 597204 » मैं हारी! भाग 2

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“ये है आज कल की नस्ल…ऐसी हो रही है आज कल की औलाद….ये है ज़माना!… ” हाशिम ख़ान ने अख़बार को तह लगाते हुए कहा था। उसी वक़्त यामीर नाश्ते की मेज़ पे आया था। अपने वालिद के मूंह से वह ये तब्सिरा सुन चुका था। 

” अस्सलाम वालेकुम बाबा।” सलाम करने के साथ-साथ उसने अपनी कुर्सी भी संभाली थी। 

“वालेकुम अस्सलाम जीते रहो।” बेटे को देखकर हाशिम खान का थोड़ी देर पहले अखबार को पढ़ाते हुए जला खून सेरों के हिसाब से बढ़ गया था। 

“औलाद इसे कहते हैं नेक, फरमाबरदार, उसूलों पर जान निछावर कर देने वाले। ज़ुबान के आगे अपने दिल को काट देने वाले।” हाशिम खान ने बगल में बैठी अपनी अम्मा को देख कर बड़े फ़ख्रिया अंदाज में कहा था। अम्मा भी यमीर को देख कर मुस्कुरा उठी थी। 

” माशाल्लाह बोलो हाशिम माशाल्लाह ….अल्लाह नज़रे बद से बचाए।” अम्मा ने प्यार भरी नजरों से यामीर को देखते हुए कहा था। 

अपनी ऐसी तारीफ पर यमीर को कभी समझ नहीं आता था के वह कैसे रद्दे अमल का इजहार कर? खुश होए, शर्माए, या चुप रहे। वह बस सोच में पड़ जाता था। इतना भरोसा, इतनी उम्मीदें… यह सारे जैसे उसके पैरों की बेड़ियां थी। बचपन से यही सुनता आया था और अब सुन सुन कर जैसे पत्थर का हो गया था। कोई जज्बात जागते ही नहीं थे…कोई एहसास दिल में पनपता ही नहीं था…. उसकी जिंदगी जैसे एक टास्क सी हो कर रह गई थी। उसे लगता था वह पैदा ही बस इसी टास्क को पुरा करने के लिए हुआ है। उसे बस हर हाल में उस टास्क को पूरा करना है…..यही उसकी जिंदगी का मकसद है। 

” तो क्या सोचा तुमने मशीनों के बारे में?” हाशिम साहब अब पूरी तरह यामीर की तरफ मुतावज्जोह हो गए थे। 

“मेरे ख्याल से सुपरवाइजर सही कह रहा है। मशीन वाक़ई बहुत obsolete हो चुकी है। उन्हें हटाना ही बेहतर रहेगा। मशीनें पुरानी होने की वजह से power consumption ज़्यादा है और मज़दूरों की जान पर भी खतरा है।” यामिर ने अपने प्लेट में पराठा लेते हुए कहा था। उसकी बात सुनकर हाशिम खान सहमत होकर अपना सर हिला रहे थे। 

“तुम्हारे पेपर कब शुरू हो रहे है?” हाशिम खान को अचानक से याद आया था। 

“अभी एग्जैक्ट डेट का तो पता नहीं मगर अगले महीने मानकर चलिए।” यामीर ने जवाब दिया था। 

“तो एक कम करो…तुम्हारे एग्जाम के खत्म होते ही सारी नई मशीनरी फैक्ट्री में इंस्टॉल हो जानी चाहिए….ये जिम्मेदारी मैं तुम्हें देता हूं।” हाशिम खान ने रौब्दार अंदाज में कहा था। 

“जी बाबा।” यामिर ने बड़े अदब से इस जिम्मेदारी को कबूल किया था। 

“मैं तो कहती हूं क्या जरूरत है इस पेपर वेपर में सर खपाने की। जिस तरह अटेंडेंस के लिए इंतजाम कर लिया है उसी तरह इस पेपर का भी इंतजाम कर लो, अपनी जगह किसी और को बैठा दो या फिर कुछ पैसे वैसे देकर फर्स्ट क्लास की डिग्री ले लो।” अम्मा ने कुछ चिढ़ कर लापरवाह अंदाज में यमीर से कहा था। उनकी बात सुनकर यामिर मुस्करा उठा था। 

“ऐसा नहीं होता दी जान।” यामीर ने मुस्कुरा कर अपनी दादी से कहा था। 

“अब ये सुनो… ये मुझे सिखा रहा है… अरे तेरा चाचा कभी कॉलेज गया था?… फिर भी बी.ए. फर्स्ट क्लास से पास है। कैसे?… तेरे बाप की बदोलत।” दी जान जोश में आ गई थी। 

“वो ज़माना और था दी जान।” यामीर ने दी जान को प्यार से देखते हुए जवाब दिया था। 

“ज़माना चाहे कोई भी हो? आगे बढ़ते ज़माने को जो रोक दे… हम उन लोगों में से है… ये बात कभी मत भूलना।” दी जान ने दबे लफ़्ज़ों में फिर ज़ो कुछ जता दिया था। यामीर को खामोश होना पड़ा। 

****

साहिबा किसी नाज़ुक सी हिरनी की तरह दौड़ती, नौकरों से टकराती, बचती, संभलती, अपने लंबे दुपट्टे के साथ साथ लंबे बालों को लेहराती छोटी बी के कमरे में पहुंची थी और अब जा कर अपनी साँसें बहाल की थी। 

“क्या हो गया साहिबा?” छोटी बी उसे देखकर हैरान और परेशान हुई थी। साहिब अपनी बेतरतीब साँसों को बहाल करने की ज़द में लगी हुई थी… उन्हें जवाब क्या ख़ाक देती? 

छोटी बी परेशानी के आलम में छोटे से टेबल की तरफ़ बढ़ी थी जिस पर पानी का जग और ग्लास रखा हुआ था। उन्होंने जल्दी से गिलास में पानी अंडेला था और उसे लेकर साहिबा के पास आई थी। साहिब ने तुरंत ग्लास थाम लिया था और एक सांसों में ही कई घूँट अपने अंदर उतारे थे। पानी पीते ही जान में जान आई तो कहा था। 

“भरजाई(भाभी), तुम ने ही तो बुलाया था।” साहिबा ने अपनी भरजाई को मोहब्बत लुटाती निगाहों से देखा था। 

“हां बुलाया था….मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम ऐसी हालात में आओ कि मेरी जान निकल जाए और मैं खुद ही भूल जाऊं कि मैंने तुम्हें बुलाया था।” छोटी बी ने नाराजगी से कहा था। 

“भरजाई ऐसा तो ना बोलो… तुम को मेरी भी उम्र लग जाए।” साहिबा तड़प कर छोटी बी के गले लग गई थी। छोटी बी ने भी उसे अपने सीने से भींच लिया था। 

“चलो छोड़ो यह सब….अब जरा ये देखो की मैंने तुम्हें बुलाया किस लिए था।” छोटी बी साहिबा को खुद से अलग करके अलमारी की तरफ बढ़ी थी और उसमें से कुछ पेपर्स निकले थे, जिसे देखकर साहिबा की आंखें फटी की फटी रह गई थी। 

“भरजाई!” बेयकिनी से निकला था। 

****

वह अभी भी नाश्ता कर रहा था जब उसका फोन बज उठा था। उसने मोबाइल की स्क्रीन पर एहसन का नाम देखा और उसने उसकी कॉल को काट दी। हाशिम खान को बेटे पर एक दफा फिर से फ़ख़्र हुआ। थोड़ी ही देर के बाद फिर से एहसन का कॉल आया और यामीर ने एक दफा फिर से कॉल काट दी और साथ ही साथ फोन को साइलेंट मोड पर भी कर दिया। फिर जब तीसरी दफा भी एहसन की कॉल आई तो हाशिम खान ने उसे फोन उठाने के लिए कहा। यामीर ने फोन उठा लिया। 

“तू कहाँ है?” ना सलाम ना दुआ एहसन ने सीधा सवाल किया। 

” वालेकुम अस्सलाम।” दी जान के सामने निकम्मे दोस्त का भरम रखा था वरना एक घंटे का लेक्चर कहीं नहीं जाता। एहसान को हैरानी हुई थी उसके सलाम के जवाब पर जो उसने किया ही नहीं था। खैर ये वक़्त इन सब बातों में उलझने का नहीं था। 

” कहां है तू?”  एहसन ने पूछा था। 

“नाश्ता कर रहा हूँ।” 

“सामने दी जान और बाबा है?” फिर से सवाल। 

“हाँ।” मुख्तसर सा जवाब। 

“हट जा वहाँ से।” मशवरे से नवाज़ा। 

“जल्दी बोलो।” मशवरा झटका। 

“सुनेगा तो गुस्से से पागल हो जाएगा।” एहसन ने चेतावनी दी। 

यामीर तुरंत यकीन ले आया। गुस्से का तेज़ तो वो था। गुस्से में क्या कर बैठता उसे ख़ुद पता नहीं होता। 

“बाद में बात करता हूँ।” यामीर ने कह कर कॉल काट दी थी। अंदर बेसुकुनी के होते हुए चेहरे पर इत्मीनान सजा कर नाश्ता करता रहा और फिर अपने कमरे में जा कर एहसन को कॉल लगाया। 

“अब बक।” गुस्से में कहा। 

“मुबारक हो मेरे यार एक और खुदकुशी तेरे इश्क़ के नाम की गई।” एहसन

ने मज़े लेते हुए कहा। 

“व्हाट?” यामीर गुस्से और बेयकिनी से चीख़ पड़ा। 

आगे जारी है:-

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