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प्रबल दावेदार

Kamlesh SenLast Seen: Apr 2, 2024 @ 9:24am 9AprUTC

28th March 2024 | 3 Views
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तुम काहे ना बिस्वास करत, 

मैं लगता क्या सरकार हूं?

बस एकही मैं आशिक़ बनन का,

‘प्रबल दावेदार’ हू।

तुम आंगन कि सी फुलवारी,

भंवरे की सुनत हो लाचारी।

देखो ना कोरा डोलता है,

खुशबू के बिना अंग खोलता है।

तुम गम से भरे फिरत दर दर, 

मैं समर्पित होता प्यार हूं।

बस एकही मैं आशिक़ बनन का, 

‘प्रबल दावेदार’ हूं।

हो अमीर घराने की मल्लिका,

बुझे को जलाती वो तिलिका।

मन देख तुझे ही टटोलता है,

कांपे जो बदन तू शौल सा है।

तुझको पाकर धनवान बनू,

तुझ बिन भूखा लाचार हूं।

बस एकही मैं आशिक़ बनन का, 

‘प्रबल दावेदार’ हूं।

प्राण हीन प्राणी हो जाता,

खोलूं जो पट तू नज़र ना आता।

दिल आपे खुद से बोलता है,

उसके आगे तेरा मौल क्या है?

तेरे अधर से लग जाए मुहर अगर,

ना रह जाता बेकार हूं।

बस एकही मैं आशिक़ बनन का,

‘प्रबल दावेदार’ हूं।

मेरी राजकुमारी तुम हो ना,

सच कहो ना कुंवारी तुम हो ना।

प्रेम धनी दीन ना तौलता है,

दिल दक्षिण हिन्द तू चौल सा है।

चुप्पी पे सबकुछ बोलता है

तेरे शासन से मन होत प्रसन्न,

करता तेरा सत्कार हूं।

बस एकही मैं आशिक़ बनन का,

‘प्रबल दावेदार’ हूं।

– आलाप✍🏻

Kamlesh SenLast Seen: Apr 2, 2024 @ 9:24am 9AprUTC

Kamlesh Sen

@Aalap

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