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विचारहीनता मतलब अध्यात्म

MOHIT BHASINLast Seen: Nov 10, 2023 @ 3:18am 3NovUTC
MOHIT BHASIN
@MOHIT-BHASIN

31st October 2023 | 10 Views

Disclaimer from Creator: भगवत गीता ही स्त्रोत है इस लेख का और हां संदीप महेश्वरी जी इसमें मुझे सबसे सफल नजर आतें है। बस यही दोनों के कथनों को मैं सरल भाषा में हर व्यक्ति को समझाना चाह रहा हूं।

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आपका मस्तिष्क ही आपके लिए सबसे बड़ी समस्या खड़ी कर देता है, आपके दिमाग में विचारों का आवागमन लगातार चलता रहता है और हम विचारो के आगोश में आकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगते हैं बस यहीं से सारे दुखों का जन्म होता है। मानव समाज में जीतने भी विवाद हैं सब इसी दिमाग की उपज हैं या यूं कहे सही ज्ञान का न होना ही इन विवादों और फसादों की जड़ है। इससे मुक्ति ही अध्यात्म है, अध्यात्म को अगर और सरल करा जाए तो आपको समझने में आसानी होगी। क्या है अध्यात्म , अध्यात्म का सबसे बड़ा लक्ष्य क्या है वो है मुक्ति। लेकिन किस से उससे जो है ही नहीं बस हमने अज्ञानवश मान रखा है। सारे विचारो का केंद्र बिंदु है वो एक विचार जिसे हम अपना अहंकार कहते हैं ये वो झूठ होता है जिसे हम सारी उमर ढोते हैं। उदाहरण के लिए यदि मैं अपने शरीर को अपना मानूं और कहूं ये शरीर मैं हूं तो आप विश्लेषण कीजिए कि क्या आप सही में ये शरीर हैं। विचार कीजिए एक बार। वास्तविकता क्या है , ये शरीर तो प्रकृति है, ये शरीर प्रकृति ने दिया है आपको। लेकिन मूल प्रश्न क्या है कि आप कौन है, क्या ये शरीर आप हैं। विचार करने पर पता लगेगा ये शरीर आप नहीं है, इस शरीर का 99% हिस्सा आप नहीं चला रहें हैं। बचा 1% उसको कौन चला रहा है वही आपकी चेतना है। यदि कोई आपकी तारीफ करे तो आप उसको क्या प्रतिक्रिया देते हैं जबकि वो तारीफ आपकी नहीं आपके शरीर की कर रहा हो। जैसे कोई आपको कहे आज आप बहुत सुंदर दिख रहें है और काफी स्मार्ट लग रहे हैं। तो यदि आप सहज ज्ञान नही रखते होंगे तो आप अत्यधिक प्रसन्न हो जाएंगे और ऐसा ही अगर कोई आपके शरीर को बुरा भला कहने लगे तब आप दुखी हो जाएंगे। लेकिन यदि आप ये जान ले कि ये शरीर आप हो ही नहीं तो आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी। विचार कीजिए । आप न ही प्रसन्न होंगे और न ही दुखी होंगे। क्योंकि आपको आपकी असलियत पता है कि आप ये शरीर नहीं हो। विचारहीनता ही अध्यात्म है। मतलब आपके अहंकार रूपी मैं का नष्ट हो जाना ही आपको भीतर से वास्तिविक संतोष प्रदान करता है। आप किसी भी स्थिति में बिलकुल सहज होकर प्रतिक्रिया दे पाएंगे क्योंकि अब आपने अपने आपको इस शरीर या प्रकृति से जोड़ कर नहीं रखा हुआ है।आप जानते हो कि वास्तविकता क्या है, सच क्या है कि आप एक चेतना मात्र हो जो इस शरीर में उपस्थित है वही सुन रही है, वही देख  रही है, वही महसूस कर रही है और वही जान रही है। यानी की वो दृष्टा तत्व आप हो जो इस शरीर रूपी उपकरण के माध्यम से इस प्रकृति में विचरण कर रहा हैं, बस यही सबसे बड़ा सत्य है यही अध्यात्म का लक्ष्य है खुद को जानना । यदि आपने सही प्रश्नों के माध्यम से ये समझ लिया और अनुभव भी कर लिया तो फिर आपको शांति में ही परमानंद की प्राप्ति होगी। विचारो को शून्य कर देना ही प्रसन्नता का सूचक है। क्योंकि तब आप सच को देख सकंगे बिना किसी मिलावट के, बिना किसी पूर्वाग्रह या पूर्व अनुभव के। इसी सच को देख लेना ही अध्यात्म है।

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