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घमंडी राजा

26th October 2023 | 12 Views

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             एक राजा था। वो राजा बड़ा धनवान था। उस राजा को अपने खुदपे और अपने संपत्ति पे बडा घमंड था। उसे लगता था कि मेरे पास ही सबसे ज्यादा संपत्ति है और मैं ही इस दुनियां में सबसे ज्यादा विद्वान हूं। इसलिये उसे अपने खुदपे पे बड़ा घमंड था। और वो अपने प्रजा पर कभी ठीक से ध्यान नही देता था। एक दिन एक बूढ़ा शिपाहि दिनभर अपना भाला लेकर राजदरबार के में खड़ा था। सुभासे खड़ा होने की वजहसे उस बूढ़े शिपहि को चक्कर आते है। और तभी उस बूढ़े शिपहि के सामने से राजा अपने सिहासन पे प्रस्थान लिए जा रहा था। और तभी वो बूढ़ा शिपहि चक्कर आनेकी वजह से उस राजा पर जा गिरता है। और वो राजा उस बूढ़े शिपहि पर बहोत घुस्सा आता है। ओर उस बूढ़े शिपहि को घुस्से से कहता है। “दिखाई नही देता तुमको अपने,राजा के ऊपर गिरते हो”। ओर उस शिपहि की एक बात ना सूने बिना उसे राज्य के बाहर भेज देता है। ओर वो बूढा शिपहि वहासे चुप-चाप चलाजाता है।

एक दीन राजा जंगल की सैर करने के लिए अपना घोड़ा लेकर चला जाता है। ओर उस जंगल सैर करते-करते उस राजा को जंगल मे एक हिरन दिख जाता है। राजा को उस हिरन का शिकार करने का मन होता है। राजा अपने बाण से उस हिरण पे तीर चलता है। लेकिन हिरन वाहसे दूसरी तरफ घास खाने को जाता है। और राजाका निशाना चूक जाता है। ओर हिरण सावधान हो जाता है। और वाहांसे भाग निकलता है। और राजा अपना घोड़ा लेकर उस हिरन का पीछा करता है। बहोत देर तक पीछा करता है,लेकिन हिरन कुछ देरबाद राजाके नजरोंके सामने से जंगलमें गायब हो जाता है।राजा जंगल मे हिरन को इधर -उधर ढूंडता है। लेकिन हिरण कही नजर नही आ रहा था।

आखिर राजा हार मैन लेता है ,ओर अपने राजवाड़े की तरफ निकलता है। राजा अपने अंदाज से राजवाड़े की तरफ निकलता है। [लेकिन राजा उस हिरण का पीछा करते -करते जंगल मे बहोत दूर ओर जंगल के बीचों-बीच पोहोचता है।]राजा घोड़े पे लहराते हुए घोडेसे जा रहा था।ओर चलते -चलते उसे खयाल आता है। कि हम बहोत देर तक घोड़े से चल रहे है। लेकिन हम जंगल के बाहर निकल ही नही रहे। ओर फिर राजा अपना घोड़ा थोडा तेज चलता है।

ओर राजा फिर अपना घोड़ा तेज चलाते -चलाते वही पोहोच जाता है। वाहासे हिरण बचकर निकल गया था। राजा अपने आपसे बात करता है। कहता है, “अरे मै तो वाहिपे आया हु, जाहा से हिरण बचके नीक गया था।

ओर अब राजा परेशान हो जाता है। ओर फिर वाहा से आगे बढ़ता है। और अब ओर भी तेजीसे अपने घोड़े को लेकर चलने लगता है। ओर चलते -चलते अब रात हो जाती है। और राजा रातमे भी अपने घोडेको लेकर चल रहा था। ओर राजा उस जंगल मे वहां पोहोच जाता है, जहा पे चोर रहते है।

ओर वो चोर राजा के गले का चमकता हुआ सोना देखकर राजा को रोकते है। ओर राजा को घोड़े से नीचे उतरते है। ओर राजा के गले का सोना लेते है। ओर सोना लेनेके झटपट की वजह से राजा के कपड़े फट जाते है।

ओर राजा का घोड़ा भी वो चोर चुराकर ले जाते है। और अब राजा के पास ना घोड़ा था, ओर नही अच्छे से कपड़े। राजाके कपड़े भी फ़टे थे।और अब राजा पैदल ही आगे बढ़ता है। सारी रात पैदल चलते -चलते थक जाता है। फिर एक जागे वो आराम करने के लिये रुकता है,ओर एक पेड़के नीचे बैठता है। और कुछ ही देर में सभा हो जाती है। धिरे-धीरे उजाला हो जाता है। ओर राजा देखता है तो क्या,वो एक रास्तेके किनारे एक पेड़ के नीचे बैठा था। राजा को राहत मिलती है। राजकी हालत बोहोत बुरी थी। जंगलसे रातको चलने की वजह से राजाके शरीर को जंगल की काटेरी झाडीया घासने की वजह से राजा के शरीर को छोटे आईथी। राजा खुनसे लतपत था। ओर राजा उस रास्तेसे अपने राजवाड़े के तरफ जाता है। और राजवाड़े में घुसने लगता है। लेकिन उसे राजवाड़े के पहारेकरि उसके फटे कपड़े देखकर,ओर राजा की बुरी हालत देखकर वो पहारेकरि उस राजा को पहचानते नही इस लिये राजाको रजवाड़े के अंदर जानेसे रोकते है। राजा कहता है। तुम मुझे रोकते हो,मै इस राज्य का राजा हु, मुझे अंदर जाने दो, फहिर भी वो पहरेकरि उसे रोकते है। ओर कहते है हम हमारे राजा को पहचानते है। हमारे राजा; ओर ऐसे हालात में, एसा नही हो सकता हमारे। तुम हमारे हमारे राजा नही हो सकते, तुम कोई बहरूपिया हो सकते है, नहीतो को चोर हो सकते हो।फिर भी राजा रट लगता है। उस पर वो पहारेकरिमेसे एक पहरेकरि राज्य के प्रधान को बूलता है। और प्रधान वाहापे आता है। ओर प्रधान उसे थोड़ी देर तक देखता है। ओर प्रधान भी उसे नही पहचान है। और उस राजा को बहरूपिया केहेकर वहासे चले जाने केलिये कहता है। फिर भी राजा अकड़के राजा सबके खीलाफ राजवाड़े के अंदर चला जाता है। तब प्रधान उसपे क्रोधित होता है। ओर अपने शिपाहियो को कहता है। शिपहियो पकड़ो उसे, ओर पकड़के इस राजवाड़े के बाहर करदो। ओर शिपाहि उसे पकड़कर राजवाड़े के बाहर फेंक देते है। राजा जोरसे गिरपडता है। राजा वाहासे चला जाता है। और चलते-चलते राजा भूकसे बेहाल हो जाता है, और थक भी जाता है। तब राजा एक अच्छे पेड़के छाओमें विश्राम करने के लिए बैठता है। और कुछ देर में एक बूढा आदमी उसे मिलता है। ओर राजा उसे देखता है। और कहता है। अरे भाई मुझे कुछ खाने को मिलेगा। मुझे बोहोत भूख लगी है।तब वो बूढा आदमी राजा को देखता है। और उस आदमी को उस राजा पे दया आती है। और वो उसे अपने घर ले जाता है। और कुछ कहने को भी देता है। ओर खाने के साथ -साथ उसे पेहेंने को कपड़े भी देता है। राजा जब नहाके कपड़े पहन के बाहर आता है। ओर बूढा आदमी चोकता है। और कहता है महाराज आप, ओर इस हालत में। तब राजा कहता है। क्या,तुमने मुझे पहचान लिया। तब बूढा आदमी कहता है, हाँ पर आपकी ये हालत कैसे हुई है। तब राजा उसे सब बता देता है, मेरे साथ क्या हुआ, कैसे मुझे राजवाड़े के बाहर निकाला। ओर फिर आखिर राजा कहता है। लेकिन तुम कोन हो, तुम्हारा नाम क्या है। तब वो बूढा आदमी कहता है। मै आपके ही राज्य का शिपहि हु। तब राजा के ध्यान में आता है। की ये वही शिपहि है, जो चक्कर आकर मुझपे गिर गया था। और इस लिये उसे राज्यके बाहर कर दिया था। राजा कहता है। बाबाजी मैने तुम्हे बिना वजह राज्यके बाहर कर दिया था। मैने आपके साथ इतनी नाहिंसाफ़ी की फिर भी तुमने मेरी मदत की, उसपे वो बूढा आदमी कहता है। ” नाहिंसाफ़ी, अपने, अपने नाहिंसाफ़ी नही की, बल्कि अपने आपके अंदर के धन के अहंकार की वजहसे नाहिंसाफ़ी की आदमी कभी गलत नही होता। आदमी उसके अहंकार के वजहसे गलत होता है। आपको अपने धन का गर्व था। इसलिये तुम्हे उसका अहंकार होने लगा। आपको लगता था। कि मै ही सबसे आमीर आदमी हु। लेकिन सिर्फ आपके पेहेचान की वजह से आप अमीर थे। जब आपके धन की पहचान की वजहसे आप लोगोको पहचाने जाते थे। आपके रहेन-सहन की वजहसे आपको लोग पहचानते थे। लेकिन जब आपका ये धन का नकाब उतर गया। तब आप लोगोंमें शून्य के भांति रह गए।” ये सब सुनकर राजाके आंखोमें आँसू आजाते है। और उस बूढ़े आदमी से माफी मांगता है। और कहता है।” मेरे पास धन था, लेकिन लोग मुझे नही, मेरे धन की वजहसे लोग मुझे पहचानते थे। मै कभी लोगोके बारे में नही जान। मै सिर्फ अपने धन के बारे में ही सोचता था। मै धन से अमीर था, लेकिन लोगोके मन से शून्य के भांति था। मैने कभी लोगोके बारेमे नही सोचा, इसलिए आज मेरे ही लोगोने मुझे नही पहचाना। मै राज्यके सब लोगोकी माफी मांगना चाहता हु।” तब वो बूढा आदमी कहता है। “मै आपकी मदत करूंगा, अब रात हो चुकी है, अब आप सोजाये, कल सुभा राजवाड़े में जाएंगे। ओर अगले दिन वो रजवाड़े में जाते है। ओर तब दो दिन से राजा का सिहासन खाली था। लेकिन राज्य के किसी भी लोगोके मन मे नही था, की राजा दो दिन से राजवाड़े में नही है। किसीकोभी कोई फर्क नही पड़ा था। सब लोग निचिंत थे। राजवाड़े के गेट के बाहर शिपहि खड़े थे, राजा उन शिपहि को देखता है , ओर बूढ़े आदमी से कहता है। बाबाजी ये शिपहि लोग अंदर नही जाने देंगे, हम अंदर कैसे जाएंगे। तब बूढा आदमी कहता है, आप चिंता न करे मैं इन्हें देखता हूं। तब राजा और वो बूढा आदमी उस शिपहि के पास जाते है। ओर वो बूढा आदमी शिपहि से कहता है। ” ये जो मेरे साथ आया है, इस कि भैस घूम गई है। हमे महराज से मिलना है। तब शिपहि कहता है।” महारज तो नही है।” तब बूढा आदमी कहता है। राज्यके प्रधान तो है ना। हमे उनसे मिलना है। तब शिपहि उन्हें अंदर जाने देते है।

और दोनों राजदरबार में जाते है। और वहां राज दरबारमे सब लोग अपने खुर्ची पे बैठे थे। और दोनों सबके सामने खड़े होते है। और बूढा आदमी उन सबसे कहता है। ये आदमी मेरे साथ आया है। और आप सबसे कुछ कहना चाहता है। तब मेरी ये विनती है, की आप सब लोग इस आदमी कि बात सुने।

तब राजा सब उन लोगोको बताता है, कि मेरे साथ पिछले दो दिनों में क्या हुआ, और मै कोन हु । [ तब सब राज दरबार के लोग उठ खड़े होते है। ] राजा अपनी बात बताही जाता है। और साथ ही उन सब लोगोकी माफी भी मांगता है। और कहता है। की अब से मै कभी अपने धन के पीछे नही रहूंगा। मै तुम सबकी माफी मांगता हूं । अबसे मै कभी आपके साथ ऐसा नही करुंगा।

Pravin Jagtap

@Pravin-Jagtap

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