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बड़ी तब्दीली सी हो गई है

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Prem SinghLast Seen: Oct 12, 2023 @ 5:07pm 17OctUTC
Prem Singh
@Prem-Singh

अस्ताचल को जाता सूरज,

धूल के उड़ते गुबार

गायों, बकरियों व भैंसों के,

गले में बँधी घंटियों की आवाज

अपने अपने मवेशी के,

आने का वो इंतजार

उन मवेशियों के रंभाने की आवाज

गुमनामी के अंधेरे में,

कहीं खो सी गई है ।

आधुनिकता के इस दौर में

बड़ी तब्दीली सी हो गई है।।

वो नदी किनारे रेत में,

बच्चों की अठखेलियाँ

काँच की गोलियों से,

खेला जाने वाला खेल

बच्चे, जवान व प्रौढ़ में

भेद मिटाकर बढ़ाता मेल

वो भँवरे की फिरकी

और गिल्ली डंडे का खेल

गुजरे वक्त की बात सी हो गई है।

आधुनिकता के इस दौर में,

बड़ी तब्दीली सी हो गई है।।

सर्दियों की रात में जलता अलाव,

मोहल्ले के बड़े छोटे सभी का जमघट

पानी भरने की अपनी बारी में खड़ी,

महिलाओं से भरा पनघट

छुपम छुपाई खेलने को,

घर से चुपचाप खिसक जाना

घर देर से पहुँचे तो,

कोई बहाना बनाना

सब भूली बिसरी यादों की,

कहानी सी हो गई है

आधुनिकता के इस दौर में,

बड़ी तब्दीली सी हो गई है

आरती के लिए हर शाम मंदिर में जाना

दोस्तों की नदी किनारे गपशप की बातें

तारों भरी रात में,

खुले आसमाँ के नीचे सोना

चाँदनी रात में,

कबड्डी की वो मीठी यादें

मोबाइल के रंग में बदरंग सी हो गई है।

आधुनिकता के इस दौर में,

बड़ी तब्दीली सी हो गई है।।

कलम से-

प्रेमसिंह ‘गौड़’

Prem SinghLast Seen: Oct 12, 2023 @ 5:07pm 17OctUTC

Prem Singh

@Prem-Singh





Published: | Last Updated: | Views: 13

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