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अभिमान क्रोध काबू में रखना

16th October 2023 | 34 Views

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अतिबलशाली, अतिअभिमानी

क्रोध नाक पर धरा रहे।

ऐसे दशकन्धर रावण को

भाई विभीषण सलाह दिये॥

हे तात, हरण परनारी का

ये धर्म विरुद्ध आचरण है।

समझो राम को साधारण

नर रूप में वह नारायण है॥

ऐसे में राम जानकी को

लाकर तुमने अपराध किया।

प्रभु राम से क्षमा माँग करके

सम्मान सहित लौटाओ सिया॥

इस पर लंकापति रावण के

गुस्से की सीमा नहीं रही॥

नहीं होगा कोई बुरा मुझसे

गर कायरता की बात कही॥

कहकर भाई विभीषण को,

डाँटा गहरा, फटकार लगाई।

मारी लात विभीषण को

और राजभवन से दिया भगाई॥

भाई के हाथों अपमानित हो

लौट विभीषण घर आया।

युद्ध अब टल पायेगा,

क्या होगा, सोच मन घबराया॥

आख़िर राम रावण मध्य

फिर भीषण महासंग्राम हुआ।

रावण, रावण की लंका और

राक्षसों का, काम तमाम हुआ॥

अभिमान, क्रोध और अहंकार,

सदबुद्धि को हर लेते हैं।

मद में इनके आकर अनुचित,

निर्णय का वरण कर लेते हैं॥

अभिमान, क्रोध को काबू में

रख पाये तो अच्छा होगा।

जीवन के सफर मेंप्रेमकहे

फिर अच्छा ही अच्छा होगा॥

कलम से

प्रेम सिंहगौड़

Prem Singh

@Prem-Singh

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